कर्म और भाग्य

Pallavi Patel

Class 11 (A)

कर्म और भाग्य

एक समय की बात है।
एक गुरुकुल में दो विद्यार्थी रहते थे।
एक का नाम कर्मबुद्धि और एक का नाम भाग्यबुद्धि।
दोनों परम मित्र थे तथा अपनी दक्षता व उत्तम व्यवहार के कारण गुरुजी के चहेते थे, परन्तु कोई भी पूरी तरह से उत्तम नहीं होता। परमेश्वर ने किसी को भी संपूर्ण नहीं बनाया है, उन दोनों में भी एक कमी थी। कर्मबुद्धि और भाग्यबुद्धि लगातार एक विवाद में उलझे रहते थे।

कर्मबुद्धि इस बात पर विश्वास रखता था कि
“मनुष्य को वही फल मिलता है जिस प्रकार के उसके कर्म रहते हैं, मनुष्य को कर्म पर आश्रित रहना चाहिए।”

उसके विपरीत भाग्यबुद्धि भाग्य को मान्यता देता था।
एक बार यह विवाद भीषण रूप ले लेता है। वे दोनों हाथापाई पर उतर आए। गुरुजी को तुरंत बुलाया गया। गुरुजी अपने दो प्रिय शिष्यों को इस तरह लड़ते देख निराश हो गए।

क्रुद्ध होते हुए वे बोले—
“हमें तुम दोनों से ऐसी आशा नहीं थी। गुरुकुल के नियमों के भंग होने पर दंड का प्रावधान है। तुम दोनों को आज दिन भर अंधेरी कोठरी में बंद किया जाएगा।”

गुरुजी के आदेश का तत्काल पालन किया गया। कर्मबुद्धि और भाग्यबुद्धि को अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया गया।

कोठरी में बंद होने के पश्चात दोनों ने विचार किया। अपनी गलती पर ध्यान हो आया। साथ ही भूख का आभास हो गया।

कर्मबुद्धि ने भाग्यबुद्धि से कहा—
“भाई भाग्यबुद्धि, अब जो गलती हो गई है उसे तो भुगतना ही होगा। परन्तु गुरुजी हमें यूँ भूखा नहीं रखेंगे। क्यों न हम भोजन ढूँढ़ने का प्रयत्न करें? तुम उधर हाथ मारो, मैं इधर ढूँढ़ता हूँ।”

भाग्यबुद्धि ने निराशा से उत्तर दिया—
“भाई, जो भाग्य में लिखा होगा वह तो होकर ही रहेगा। अगर किस्मत में भोजन रहेगा तो भोजन अवश्य प्राप्त होगा। व्यर्थ में मेहनत करने का कोई फायदा नहीं है।”

भाग्यबुद्धि की निराशा भरी बातों को अनसुना करते हुए वह अंधेरे में ही टटोलने लगा।

कोशिश का फल उसे मिला—एक लोटा पानी तथा एक कटोरी चने जो कंकड़ों से भरे थे।

कर्मबुद्धि भाग्यबुद्धि को कंकड़ बीनकर देते हुए चिढ़ाते हुए कहता है—
“अगर मेरी बात मान लेते तो शायद तुम्हें भी भोजन प्राप्त होता। अब तो मानोगे कि मनुष्य को सदैव कर्म पर निर्भर होना चाहिए। यह कंकड़ तुम रखो, यही तुम्हारे भाग्य में था।”

भाग्यबुद्धि अपना भाग्य समझकर कंकड़ रख लेता है और भूखा रहना स्वीकार करता है।

एक दिन होने के पश्चात दोनों को गुरुजी के सामने प्रस्तुत किया जाता है।

कर्मबुद्धि घमंड करते हुए कहता है—
“गुरुजी, आपके द्वारा कोठरी में चने छोड़े गए थे। मेरी बात न मानकर, कर्म छोड़कर भाग्य भरोसे बैठने के कारण इसके हिस्से में कंकड़ ही आए हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म श्रेष्ठ होता है और मानव मात्र को कभी भाग्य भरोसे नहीं बैठना चाहिए।”

गुरुजी शांति से बोले—
“भाग्यबुद्धि, अपने कंकड़ों को दिखाओ।”

और आश्चर्य! वे कंकड़ नहीं अपितु छोटे हीरे थे। भाग्यबुद्धि का निराश चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा।

गुरुजी कर्मबुद्धि और भाग्यबुद्धि दोनों को समझाते हुए कहते हैं—
“भाग्यबुद्धि, अगर तुम कर्मबुद्धि की बात मानकर कर्म करते तो तुम्हें भूखा नहीं रहना पड़ता और कर्मबुद्धि, अगर तुम सदाचारवश चने बाँटते तो तुम्हारे हिस्से में भी हीरे आते।”

“बच्चो! मेरी यह बात सदैव याद रखना। कर्म और भाग्य एक-दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य के जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं तथा दोनों के साथ से ही जीवन संतुलित होता है। किसी एक को श्रेष्ठ मानना निरर्थक है।

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