Istekhar Alam
TGT MATHS
मर्द को दर्द नहीं होता हैं
मर्द को दर्द नहीं होता हैं –
शायद इसलिए याद नहीं मुझे,
मैं कब एक लड़के से मर्द हो गया।
बस्तों का बोझ ढोते-ढोते,
मैं कब ग़म का बोझ अकेले ही ढो गया।।
अकेलेपन में लिपटा हूँ,
पर सब ग़म छुपा लेता हूँ।
ज़िम्मेदारियों के भंवर में,
मैं न जाने कितना खो चुका हूँ।।
आँसुओं की सिसकियाँ अब
चादरों की ओर में ही सुनाई पड़ती हैं।
मेरी शिकायतें अब,
मेरे गुस्से में ही दिखाई पड़ती हैं।।
चुप लड़की की तरह क्यों रोता है, ये कहकर
इस ज़माने ने क्यों, मुझे इतना कठोर बना दिया है।
मुझसे बिना पूछे ही,
मेरे ग़मों को पानी में बहा दिया है।।
अरे मर्द होने के लिए,
बेदर्द होना ज़रूरी हैं क्या।
हर बार बंद कमरे में रोना
ज़रूरी हैं क्या।।
