दृश्य संभावनाओं से भरा है

Adhikalp Sahu

TGT Arts

दृश्य संभावनाओं से भरा है

दृश्य – 1

जंग लगी शिलाखंडों को तोड़कर
जब गलाया होगा लोहा पहली बार,
तब संघर्षों की आदिम स्मृतियों को भी ढाल लिया गया होगा
हथियारों को मज़बूत करने की प्रक्रिया में।

तब बरछे-भालों के साथ ढले होंगे
हल, गैंती, कुदाली भी।

आज संघर्ष युद्ध में बदल गए
और औज़ार हथियार में।

पृथ्वी वही शिलाखंड है इस समय।


दृश्य – 2

खेतों में चिड़ियों के झुंड उतर रहे हैं।
शायद संभावनाओं के बीज बोए हैं इस बार।
शायद घर के आँगन तक पहुँच जाए अनाज,
शायद चिड़िया मुंडेर से फिर आँगन में उतर आए — बेझिझक।

शायद खनखनाहट से गूँज जाए गुड़िया की गुल्लक इस बार।

चिड़ियों का एक झुंड बाज़ार की तरफ उड़कर गया है,
इस समय बाज़ार में आँगन नहीं होता।

दृश्य संभावनाओं से भरा है।


दृश्य – 3

जब बेटी की चोटी गूँथता हूँ,
धूप-दोपहर कितनी संभावनाएँ गूँथ लेता हूँ एक साथ।

जब बेटी दौड़कर सड़क पार करती है — बेझिझक,
और खरीद लाती है — बुढ़िया के बाल, गुलाबी, सफेद और कई रंगों वाले,
तब दृश्य संभावनाओं से भर जाता है।

अब बेटी बड़ी हो रही है,
दृश्य संभावनाओं से भरा है इस समय।

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