Neeta Thwait
TGT Science
मायने ज़िंदगी के
बंद मुट्ठी से, रेत की मानिंद, फिसलती जाती हो, ज़िंदगी!
बीतती चली जाती हो, ज़िंदगी!
ये माना, रास्ता हो तुम,
तो ये मोड़ आते-जाते रहेंगे
और हमें चलना भी सिखाते रहेंगे।
किसी मोड़ पर पर्वत, तो कहीं खाई होगी,
गुज़र कर इनसे ही मंज़िल ज़रूर आई होगी।
मंज़िल पाने की खुशी, ज़ेहन में शायद
अब भी समाई होगी।
फिर भी तुम बार-बार, कभी खुशियों तो कभी ग़म से भरे स्वप्न
क्यों दिखाती हो, ज़िंदगी?
बिन तुम्हारे सब कुछ बेमानी है,
बार-बार पूरी शिद्दत से
ये एहसास क्यों कराती हो, ज़िंदगी?
कभी तो चलने दो सीधी-सी राह पर,
कितने गहरे-गहरे मोड़ पर लाती हो, ज़िंदगी!
फिसलती ही जाती हो बंद मुट्ठी से,
रेत की मानिंद, तुम ज़िंदगी!
