Neeta Thwait
TGT Science
वर्तमान सामाजिक परिवेश में युवा
वर्तमान सामाजिक परिवेश तीव्र परिवर्तन का दौर है। विज्ञान, तकनीक, वैश्वीकरण और सूचना क्रांति ने समाज की संरचना, सोच और जीवन-शैली को गहराई से प्रभावित किया है। इस परिवर्तन के केंद्र में आज का युवा वर्ग है, जो समाज की सबसे ऊर्जावान, जागरूक और परिवर्तनशील शक्ति माना जाता है।
शास्त्रों में भी युवा शक्ति को विशेष महत्व दिया गया है—
“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”
(अर्थात परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल इच्छाओं से नहीं।)
आज का युवा पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष और वैश्विक दृष्टिकोण वाला है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने युवाओं को ज्ञान, अभिव्यक्ति और अवसरों की नई दुनिया से जोड़ा है। वे अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी राय रखते हैं और सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार, खेल, कला और विज्ञान के क्षेत्र में युवा देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
यह स्थिति उस विचार को साकार करती है—
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
(ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में कुछ भी नहीं है।)
हालाँकि, वर्तमान सामाजिक परिवेश युवाओं के सामने अनेक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बेरोज़गारी, परीक्षा-दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ और भौतिकवाद युवाओं को मानसिक तनाव की ओर ले जा रहे हैं। सोशल मीडिया के अति प्रयोग से समय की बर्बादी, तुलना की भावना और वास्तविक संबंधों में कमी जैसी समस्याएँ भी उभर रही हैं। कई बार युवा सही-गलत के बीच भ्रमित हो जाते हैं।
ऐसे समय में यह श्लोक मार्गदर्शन करता है—
“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।”
(मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और शत्रु भी।)
इसके बावजूद, युवा वर्ग में समाज को नई दिशा देने की अपार क्षमता है। यदि उन्हें सही मार्गदर्शन, मूल्यपरक शिक्षा और सकारात्मक वातावरण मिले, तो वे सामाजिक कुरीतियों को दूर कर सकते हैं। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, डिजिटल साक्षरता और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कर्म और दायित्व की भावना को यह श्लोक पुष्ट करता है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
