Priya Kumari
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छोटी सी ज़िन्दगी
छोटी सी ज़िंदगी
इस छोटी सी ज़िंदगी में बहुत चीज़ों से खेला है।
आज मैं तुम्हें बताऊँ कि मैंने क्या-क्या देखा है।
धूप में बदन को जलते,
तो आत्माओं को झुलसते हुए भी देखा है।
उन नन्हे हाथों को भीख माँगते,
तो उन शहज़ादों को पैसे उड़ाते हुए भी देखा है।
कुछ को इज़्ज़त-आबरू बेचते,
तो कुछ को उनसे खेलते हुए देखा है।
गरीबी में तवे पर रोटी के साथ
माँ की छाती को भी जलते हुए देखा है।
दूध के लिए बिलखते बच्चों को भी देखा है,
और वही दूध शिलाओं पर बहते देखा है।
मजबूरी में रोते हुए लोगों को
पत्थरों पर विश्वास करते हुए देखा है।
सच कहूँ, मैंने मंदिरों में ‘बर्फ़ानी बाबा’ को भी शाल ओढ़ते देखा है।
